वो बावली, शर्मीली
पहले बातों में उलझाया, जुल्फों को सुलझाया !
पलकों को भीगाकर, रख दी ओंठ पर ही ओंठ।
ना देखती वो जरा सा, मैं रोम-रोम डरा सा।
शब्द तो नहीं थे लेकिन, थे जज्बात अनसुना सा !
कल की बातूनी छोकरी, अभी मौन सी पड़ी थी ।
बाहों में यूं जकड़कर, मानो शून्य सी हो चली थी ।।
इससे मैं न हैरान था, बस बंधन से अंजान था ।
शायद समझ रहा था प्रेम को, जो कि सरल और आसान था ।।
थोडा दूर उसे हटाकर, गालों को सहलाकर !
ये प्रेम है या है ये रति, पूछा उसे बहलाकर !!
वो बावली, शर्मीली, पहले बोलना तो चाहा।
कुछ ना कहो, कुछ ना पूछो, धीरे से फुसफुसाया ।
कुछ बोलता पहले कि, करीब और आ गयी।
मुझे अपना बनाना चाहा, यूं आगोश में समा गयी।
देखते ही देखते, सारे फासलें मिट गये !
करके आजाद खुद को, एक दूजे से लिपट गये !!
भूल जाओ ये जमाना, कैद कर दो रूह मुझमें ।
अब किसका राह है देखती, हो लिया न तेरे संग में ।।
अब जो हो रहा हो जाने दो, एक दूसरे में रंग जाने दो ।
मुझमें खुद को घोल दो, बांध दिल के खोल दो।
है प्रेम की जो प्रगाढ़ता, ढह जाने दो बह जाने दो ।।
थम सा गया है ये लम्हा, फिर क्यूं पड़ी हो ऐसे तन्हा,
हम-तुम इक हो जाने दो। प्रीति रस को आने दो।!
मुझे तुझमें अब समाने दो, समाने दो, समाने दो ।।
वो बावली, शर्मीली।।
जो हो रहा हो जाने दो।।
— प्रत्युष कुमार 'भारत'