✍️ Creative Writings

Poems, Thoughts & Stories

Beyond science and equations, there are verses and stories — a different way of understanding the world. Here are my creative writings, some of which have been published.

Pratyush Kumar 'Bharat'

A computational fluid dynamicist by profession, and a poet by heart. I write in Hindi, often reflecting on life, relationships, and the human experience. Some of my poems have been featured in Amar Ujala Kavya — one of India's most respected literary platforms.

Poetry · पिता

Father (पिता)

— प्रत्युष कुमार 'भारत'

January 2022 Amar Ujala Kavya Family · Life
वो जुआडी सौदे का कच्चा था । मगर मेरे लिए तो अच्छा था । खेल गया हर दांव, अपनी जिंदगी की । लगा दी बोली , अपनी हर ख्वाईसों की । उसे था भरोसा मुझ प्यादें पर वो लुटाता गया । मैं मढता गया ।। वो भूल चुका था , अपने शौकीनों को । दरकिनार कर दिया हर इक अरमानों को । लुटा दी अपनी सारी दौलत । मेरें पंखो के बदौलत । ये बावले नशेडी क्यूं किया इस नशे का आगाज । बिक सकता था और हो जाता बर्बाद । लेकिन आज जहां भी मैं खुद को पाता हूं । हर बार यही दोहराता हूं । आप ही वो शख्सियत जिसकी बदौलत, आज मैं उड सका इन उँचाईयों को । मैं तैर सका हर मुश्किलों को । इन लंबी उडानों का स्वाद जो मुझे चखा दिया । खुद को घिसकर मुझे निखरना सिखा दिया । ये मंजिल तो अभी कुछ नहीं बहूत दूर जाना बाकि है । आपने तो अपनी पारी खेल ली । हर कठिनाइयाँ झेल ली । मुझे बहुत कुछ करना बाकि है। निश्चिंत रहो, हे पित्र मेरी परिपक्व तैयारी है। कर दो ऐलान दुनिया को अब यहां से मेरी बारी है। — प्रत्युष कुमार 'भारत'
Poetry · प्रेम

First Kiss (पहली चुम्बन)

— प्रत्युष कुमार 'भारत'

2022 Amar Ujala Kavya Love · Romance
वो बावली, शर्मीली पहले बातों में उलझाया, जुल्फों को सुलझाया ! पलकों को भीगाकर, रख दी ओंठ पर ही ओंठ। ना देखती वो जरा सा, मैं रोम-रोम डरा सा। शब्द तो नहीं थे लेकिन, थे जज्बात अनसुना सा ! कल की बातूनी छोकरी, अभी मौन सी पड़ी थी । बाहों में यूं जकड़कर, मानो शून्य सी हो चली थी ।। इससे मैं न हैरान था, बस बंधन से अंजान था । शायद समझ रहा था प्रेम को, जो कि सरल और आसान था ।। थोडा दूर उसे हटाकर, गालों को सहलाकर ! ये प्रेम है या है ये रति, पूछा उसे बहलाकर !! वो बावली, शर्मीली, पहले बोलना तो चाहा। कुछ ना कहो, कुछ ना पूछो, धीरे से फुसफुसाया । कुछ बोलता पहले कि, करीब और आ गयी। मुझे अपना बनाना चाहा, यूं आगोश में समा गयी। देखते ही देखते, सारे फासलें मिट गये ! करके आजाद खुद को, एक दूजे से लिपट गये !! भूल जाओ ये जमाना, कैद कर दो रूह मुझमें । अब किसका राह है देखती, हो लिया न तेरे संग में ।। अब जो हो रहा हो जाने दो, एक दूसरे में रंग जाने दो । मुझमें खुद को घोल दो, बांध दिल के खोल दो। है प्रेम की जो प्रगाढ़ता, ढह जाने दो बह जाने दो ।। थम सा गया है ये लम्हा, फिर क्यूं पड़ी हो ऐसे तन्हा, हम-तुम इक हो जाने दो। प्रीति रस को आने दो।! मुझे तुझमें अब समाने दो, समाने दो, समाने दो ।। वो बावली, शर्मीली।। जो हो रहा हो जाने दो।। — प्रत्युष कुमार 'भारत'
"Science tells us how the world works — poetry tells us why it matters."